भारतीय इतिहास-लेखन की परम्परा भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना के पश्चात् 18 वीं शताब्दी में प्रारम्भ हुई । भारत के इतिहास को पुनर्जीवित करने में "एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल" की भूमिका उल्लेखनीय रही, जिसकी स्थापना 1784 ई. में कलकत्ता में वारेन हेस्टिंग्स एवं सर विलियम जोन्स के द्वारा हुई ।
महाभारत के रचियता वेदव्यास के अनुसार महाराज दुष्यन्त के पुत्र सम्राट भरत के नाम पर "भरत का देश" इस आशय से "भारतवर्ष" नाम पड़ा ।
ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार :
- "भरत एक चक्रवर्ती राजा थे, जिन्होंने चार दिशाओं तक भूमि को जीतकर एक विशाल साम्राज्य का वरण किया एवं अश्वमेघ यज्ञों से यजन किया था, जिससे उनके नाम पर "भारतवर्ष" का नामकरण हुआ ।मत्स्य पुराण की एक अनुश्रुति में आदि प्रजापति एवं न्याय के व्यवस्थापक महाराज मनु को प्रजा का भरण-पोषण करने एवं जन्म देने के कारण "भरत" तथा जिस भू-भाग पर मनु की शासन व्यवस्था प्रचलित थी, उसे "भारतवर्ष" कहा गया ।
जैनियों एवं भागवतों की परम्परा के अनुसार भगवान् ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र का नाम भरत था, जो श्रेष्ठ गुणयुक्त एवं महायोगी था; उस भरत के नाम पर ही "भारतवर्ष" नामकरण हुआ ।
वैदिक आर्यों की "भरत जाति" के नाम पर इस देश का "भारतवर्ष" नाम माना जा सकता है, क्योंकि यह जाति तत्कालीन परिवेश में राजनीतिक शक्ति, वैदिक साहित्य एवं सभ्यता के विकास में अग्रणी थी । इस तथ्य को सिद्ध करते हुए वायुपुराण में अभिव्यक्त है -
"उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्ष तद् भारतं नाम भारतीः यत्र सन्ततिः ।।"
"हिन्दुस्तान" नाम इसे ईरानियों ने दिया । ये लोग 'स' को 'ह' उच्चारित करते थे, इसी के चलते 'सिन्धु नदी' के आसपास रहने वालों को 'हिन्दू' एवं उस भू-भाग को "हिन्दुस्तान" नाम दिया गया ।
यूनानियों ने भारत को "इण्डिया" नाम दिया । वे सिन्ध नदी को 'इण्डस' पुकारते थे, इसी के फलस्वरूप उस क्षेत्र को "इण्डिया" एवं वहां पर निवास करने वालों को "इण्डियन" कहा गया ।
इतिहासकार प्राचीन भारतीय इतिहास को तीन भागों में बाँटते हैं । वह काल जिसके लिए कोई लिखित साधन उपलब्ध नहीं है, जिसमे मानव का जीवन अपेक्षाकृत पूर्णतया सभ्य नहीं था, "प्रागैतिहासिक काल" कहलाता है । जिसके लिए लिखित साधन उपलब्ध हैं और मानव सभ्य बन गया था, "ऐतिहासिक काल" कहलाता है ।
प्राचीन भारत के इतिहास में एक ऐसा भी समय था जिसके लिए लेखन के प्रमाण तो हैं किन्तु या तो वे अपुष्ट हैं या फिर उनकी गूढ़ लिपि का अर्थ निकालना कठिन है । इस काल को भारतीय इतिहासकार "आद्य इतिहास" कहते हैं । हड़प्पा की संस्कृति और वैदिककालीन संस्कृति की गणना "आद्य इतिहास" में की जाती है ।
No comments:
Post a Comment